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हज़ारों साल बीते हैं!
हज़ारों साल बीते हैं हज़ारों साल बीतेंगे,बदल जाएगी कल तक़दीर-ए-इंसाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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गरेबाँ हम नहीं कहते!
बहारों से जुनूँ को हर तरह निस्बत सही लेकिन,शगुफ़्त-ए-गुल को आशिक़ का गरेबाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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हम नहीं कहते!
न बू-ए-गुल महकती है न शाख़-ए-गुल लचकती है,अभी अपने गुलिस्ताँ को गुलिस्ताँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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मगर इस ज़ुल्फ़ को!
किसी आशिक़ के शाने पर बिखर जाए तो क्या कहना,मगर इस ज़ुल्फ़ को ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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कोहरा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री अश्वघोष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। अश्वघोष जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अश्वघोष जी का यह नवगीत – पता नहीं किस ज़ालिम डर सेउठा नहीं सूरज बिस्तर से । मुख पर हाथ धरे कोलाहल,ढूँढ़ रहा…
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किसी भी हुस्न को!
नज़र की इंतिहा कोई न दिल की इंतिहा कोई,किसी भी हुस्न को हुस्न-ए-फ़रावाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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किसी भी दर्द को !
अगर हद से गुज़र जाए दवा तो बन नहीं जाता,किसी भी दर्द को दुनिया का दरमाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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चराग़ाँ हम नहीं कहते!
तुम्हारे जश्न को जश्न-ए-फ़रोज़ाँ हम नहीं कहते,लहू की गर्म बूँदों को चराग़ाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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तू न अब आए तो क्या!
तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है,सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए| जाँ निसार अख़्तर
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चाँद निकला भी तो!
आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें,चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए| जाँ निसार अख़्तर