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न दिन को अब्र आए!
ये ज़िद है याद हरीफ़ान-ए-बादा-पैमा की, कि शब को चाँद न निकले न दिन को अब्र आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इक उम्र होने आई है!
कोई पुकारो कि इक उम्र होने आई है,फ़लक को क़ाफ़िला-ए-रोज़-ओ-शाम ठहराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गेसू फ़ज़ा में लहराए!
शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम,शब-ए-फ़िराक़ के गेसू फ़ज़ा में लहराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बुत से दोस्ताना किया!
वो हीला-गर जो वफ़ा-जू भी है जफ़ा-ख़ू भी,किया भी ‘फ़ैज़’ तो किस बुत से दोस्ताना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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किया तो क्या न किया!
थे ख़ाक-ए-राह भी हम लोग क़हर-ए-तूफ़ाँ भी,सहा तो क्या न सहा और किया तो क्या न किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सुलूक जिस से किया!
ग़म-ए-जहाँ हो रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू*,सुलूक जिस से किया हम ने आशिक़ाना किया| *Enmity फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आज किस ने सुख़न!
ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया,फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ाएबाना* किया| *Unseen फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दो हाथ!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। ओम प्रभाकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत – ये फैलेखुलेदो हाथये करें तो क्या करें? छिली-कुचली-कसमसाती अँजुरियों मेंधुआँ-कोहरा-रेत ये कैसे भरें!…
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ख़ास सड़कें बंद हैं!
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए, ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है| दुष्यंत कुमार
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एक गुड़िया की कई!
एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है, आज शाइ‘र ये तमाशा देख कर हैरान है| दुष्यंत कुमार