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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Aug 2025

    आज बचपन कहीं!

    आज बचपन कहीं बस्तों में ही उलझा है ‘सहाब’,फिर वो तितली को पकड़ना वो उड़ाना आए| अजय सहाब

  • 19th Aug 2025

    स्कूल से छुट्टी जो मिले!

    आह सहसा कभी स्कूल से छुट्टी जो मिले,चीख़ कर बच्चों का वो शोर मचाना आए| अजय सहाब

  • 19th Aug 2025

    काश उस्तादों को!

    हम को क़ुदरत ही सिखा देती है कितनी बातें,काश उस्तादों को क़ुदरत सा पढ़ाना आए| अजय सहाब

  • 19th Aug 2025

    रूठूँ तो मनाना आए!

    काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी,जब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आए| अजय सहाब

  • 19th Aug 2025

    हाथों में ख़ज़ाना आए!

    काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर,काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए| अजय सहाब

  • 19th Aug 2025

    अवशिष्ट!

    एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी लेखक, कवि और संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह नवगीत- दुख आयाघुट घुटकरमन-मन मैं खीज गया सुख आयालुट लुटकरकन…

  • 18th Aug 2025

    बचपन का ज़माना आए!

    यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए,फिर वो मा’सूम सा बचपन का ज़माना आए| अजय सहाब

  • 18th Aug 2025

    ज़िंदगी उम्र में कुछ!

    मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    तू मिरे साथ अगर है!

    तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    तिरे ज़ख़्मों के निशाँ!

    ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना

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