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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Aug 2025

    चुपचाप देखती रही!

    लट्टू की तरह घूम के चौराहा सो गया,चुपचाप देखती रही खिड़की खुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    दरिया के पास धूप!

    दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    शहर की भाषा धुली हुई!

    कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    मुझको मिली कल एक!

    अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    मेरे लहू में घुली हुई!

    मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई,क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    मेरे सीने में क्यूँ!

    देने वाले ये हस्सास नाज़ुक सा दिल,मेरे सीने में क्यूँ ख़ास कर रख दिया| उदय प्रताप सिंह

  • 21st Aug 2025

    शाहदरा-कुछ स्मृतियां!

    फिर एक बार याद आया शाहदरा। दिल्ली का यह यमुना-पार, हम थे जब यहाँतब एक ही पुल था यमुना परअंग्रेजों के ज़माने का,अब उम्र है उसकी सौ वर्ष से अधिक, नीचे कार-बस, ऊपर रेल। हमारे समय में अकेला थायह पुल चींटियों की तरह रेंगती थीं बसें इसमें, बात है 1950 से 80 तक की। शाहदरा,…

  • 20th Aug 2025

    सच ने तलवार के!

    आख़िरी फ़ैसला वक़्त के हाथ है,सच ने तलवार के आगे सर रख दिया| उदय प्रताप सिंह

  • 20th Aug 2025

    आईना बे-वजह!

    अपना चेहरा न पोंछा गया आप से,आईना बे-वजह तोड़ कर रख दिया| उदय प्रताप सिंह

  • 20th Aug 2025

    आँधी का डर रख दिया!

    तुम ने ये क्या किया बत्तियों की जगह,इन चराग़ों में आँधी का डर रख दिया| उदय प्रताप सिंह

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