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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Aug 2025

    टूटना तय था !

    एक अफ़वाह थी सभी रिश्ते,टूटना तय था और हम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    कोई क़सम टूटे!

    बाँध टूटा नदी का कुछ ऐसे,जिस तरह से कोई क़सम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    हम तो हर क़दम टूटे!

    शायरी, इश्क़, भूख, ख़ुद्दारी,उम्र भर हम तो हर क़दम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    आईने, आईने रहे, गरचे!

    आईने, आईने रहे, गरचेसाफ़गोई में दम-ब-दम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    कुर्सियों का नहीं!

    कुर्सियों का नहीं कोई मज़हब।,दैर ढह जाये या हरम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    उसको सोचो तो!

    आई थी जिस हिसाब से आँधी,उस को सोचो तो पेड़ कम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    जैसे कोई गिलास, हम टूटे!

    एक हल्की सी ठेस लगते ही,जैसे कोई गिलास – हम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 22nd Aug 2025

    मौसम पर कविता

    आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- किस मौसम पर कविता लिखेंआप ही बताओ जी। गर्मी- जब लू से झुलसकरमरते हैं लोग, जो भी हो, काम पर तो जाना हैवरना कौन देगा मजूरीवहाँ एसी, कूलर की तो बात क्यापंखा भी नहीं होता जी, जहाँ तपती धूप मेंदिहाड़ी पकानी होती है। बरसात पर…

  • 21st Aug 2025

    अच्छा हुआ भरम टूटे!

    रंज इस का नहीं कि हम टूटेये तो अच्छा हुआ भरम टूटे। सूर्यभानु गुप्त

  • 21st Aug 2025

    मुरली सा कोई शख्स!

    मुरली सा कोई शख्स बजा जब भी ध्यान में,मेरे बदन की आबो-हवा गोकुली हुई। सूर्यभानु गुप्त

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