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जाने का उस के रंज!
उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी
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यही दिल में डर रहा!
ख़ौफ़ आसमाँ के साथ था सर पर झुका हुआ,कोई है भी या नहीं है यही दिल में डर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दूरी का ये तिलिस्म!
गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी,दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी
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हरिजन टोली!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह जी की यह कविता – हरिजन टोली में शाम बिना कहे हो जाती है ।पूरनमासी हो या अमावसरात के व्यवहार में कोई…
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मेरी सदा हवा में!
मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गई, पर मैं बुला रहा था जिसे बे-ख़बर रहा| मुनीर नियाज़ी
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याद अक्सर वो हमें!
हम पे हो जाएँ न कुछ और भी रातें भारी,याद अक्सर वो हमें अब सर-ए-शाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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हम तड़पते हैं तो!
हम न चाहें तो कभी शाम के साए न ढलें,हम तड़पते हैं तो सुब्हों के सलाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई
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ज़िंदगी बन के वो!
ज़िंदगी बन के वो चलते हैं मिरी साँस के साथ, उन को ऐसे कई अंदाज़-ए-ख़िराम आते हैं| क़तील शिफ़ाई