-
आग मुट्ठी में दबी है!
हाथ जल जाएगा छाला न कलेजे का छुओ,आग मुट्ठी में दबी है न समझना पानी| आरज़ू लखनवी
-
बाबुल तुम बगिया के तरुवर!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की ये कविता- बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रेदाना चुगते उड़ जाएँ…
-
कोई मतवाली घटा थी!
कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग, जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी| आरज़ू लखनवी
-
उतरेगा ये चढ़ता पानी!
फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान,दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी| आरज़ू लखनवी
-
सैंकड़ों डूब गए!
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी,सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी| आरज़ू लखनवी
-
इस में अपना-आप!
फटा-पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ‘ताबिश‘, इस में अपना-आप छुपाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
-
रात की पेशानी का!
ये महताब ये रात की पेशानी का घाव,ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है| अब्बास ताबिश