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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Mar 2025

    आग मुट्ठी में दबी है!

    हाथ जल जाएगा छाला न कलेजे का छुओ,आग मुट्ठी में दबी है न समझना पानी| आरज़ू लखनवी

  • 27th Mar 2025

    बाबुल तुम बगिया के तरुवर!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की ये कविता- बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रेदाना चुगते उड़ जाएँ…

  • 26th Mar 2025

    कोई मतवाली घटा थी!

    कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग, जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    उतरेगा ये चढ़ता पानी!

    फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान,दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    टूट के बरसा पानी!

    किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी,झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    आँख से टपका पानी!

    दिल से लौका जो उठा आँख से टपका पानी,आग से आज निकलते हुए देखा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    फूट भी जाएगा छाला!

    आँख से बह नहीं सकता है भरम का पानी,फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    सैंकड़ों डूब गए!

    रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी,सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Mar 2025

    इस में अपना-आप!

    फटा-पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ‘ताबिश‘, इस में अपना-आप छुपाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

  • 25th Mar 2025

    रात की पेशानी का!

    ये महताब ये रात की पेशानी का घाव,ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है| अब्बास ताबिश

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