-
अपने हँसते चेहरे!
चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा,अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे| बशर नवाज़
-
तुम भी तंग आ जाओगे!
रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे,तुम भी तंग आ जाओगे इक दिन हम भी उक्ता जाएँगे| बशर नवाज़
-
वे हवाएं खो गई हैं!
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ लेकर मैं कभी जिनको चला था, रास्ते में वे हवाएं खो गई हैं। वे सुकोमल भाव के स्वप्निल बिछौने कूदते वे सृजन के मदमस्त छौने, सफलता की राह पर आगे बढे़ तब सिरफिरी परिकल्पनाएं खो गई हैं। पेट की खातिर यहाँ जीवन जिए हैं…