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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Aug 2025

    कैफ़ियत दिल की सुनाती !

    कैफ़ियत दिल की सुनाती हुई एक एक निगाह,बे-ज़बाँ हो के भी वो माइल-ए-गुफ़्तार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 31st Aug 2025

    तिरछी नज़रों में वो!

    तिरछी नज़रों में वो उलझी हुई सूरज की किरन, अपने दुज़्दीदा इशारों में गिरफ़्तार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 31st Aug 2025

    वो ग़म-ख़्वार आँखें!

    वो मिरी दोस्त वो हमदर्द वो ग़म-ख़्वार आँखें,एक मासूम मोहब्बत की गुनहगार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 31st Aug 2025

    हर दिल में है इक ज़ख़्म!

    हर हँसते हुए फूल से रिश्ता है ख़िज़ाँ का,हर दिल में है इक ज़ख़्म छुपा तुम भी तो देखो| बशर नवाज़

  • 31st Aug 2025

    ठहरे हुए पानी की !

    किस तरह किनारों को है सीने से लगाए,ठहरे हुए पानी की अदा तुम भी तो देखो| बशर नवाज़

  • 31st Aug 2025

    चुप-चाप सुलगता है!

    चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो,किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो| बशर नवाज़

  • 31st Aug 2025

    तेज़ हवाएँ आँखों में !

    तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं,जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे| बशर नवाज़

  • 31st Aug 2025

    सूरज किधर गया!

    आज प्रस्तुत है एक और रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कई दिनों से देख रहा हूँसूरज किधर गया, कहीं राह में खेल रहा हैया अपने घर गया। बस्ता यहाँ पड़ा दिखता हैमार लगाऊंगावापस आ जाए फिर लंबी क्लास चलाऊंगा वर्षा का वह बना बहानाजाने किधर गया। अच्छा चलन नहीं दिखता हैउसका कुछ दिन सेइधर…

  • 30th Aug 2025

    ख़्वाबों को झुलसाएँगे!

    इस जानिब हम उस जानिब तुम बीच में हाइल एक अलाव,कब तक हम तुम अपने अपने ख़्वाबों को झुलसाएँगे| बशर नवाज़

  • 30th Aug 2025

    अब मिल जाए मनाएँगे!

    वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था, नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे| बशर नवाज़

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