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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Sep 2025

    रात के तारों का हुजूम!

    सेहन-ए-ज़िंदाँ में है फिर रात के तारों का हुजूम,शम्अ’ की तरह फ़रोज़ाँ सर-ए-दीवार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    सेहत-ए-दिल जो अता!

    रूह को रोग मोहब्बत का लगा देती हैं,सेहत-ए-दिल जो अता करती हैं बीमार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    मुखड़े पे चमकते तारे!

    हुस्न के चाँद से मुखड़े पे चमकते तारे,हाए आँखें वो हरीफ़-ए-लब-ओ-रुख़सार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    आँच में अपनी जवानी की!

    आँच में अपनी जवानी की सुलगती चितवन,शबनम-ए-अश्क में धोई हुई गुलनार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    कभी घोले हुए शीरीनी!

    नोक-ए-अबरू में कभी तलख़ी-ए-इंकार लिए,कभी घोले हुए शीरीनी-ए-इक़रार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    कभी झुकते हुए बादल!

    कभी झुकते हुए बादल कभी गिरती बिजली,कभी उठती हुई आमादा-ए-पैकार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    कभी सहमा हुआ सिमटा!

    कभी ठहरी हुई यख़-बस्ता ग़मों की झीलें,कभी सहमा हुआ सिमटा हुआ इक प्यार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 1st Sep 2025

    गीत अधूरे!

    आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत पड़े हैंकई अधूरे अलमारी में ठोक पीटकर शीघ्र उन्हे पूरा करना है। कहीं कमी है अनुभव की, संवेदन नहीं कहींकिसी गीत की भावभूमि अब अपनी नहीं रही जो भी हो, उनके खालीहिस्सों को भरना है। इन गीतों कोकुछ विद्वान दूर से निरखेंगेकुछ अपने पैमानों…

  • 31st Aug 2025

    कभी छलकी हुई!

    कभी छलकी हुई शर्बत के कटोरों की तरह,और कभी ज़हर में डूबी हुई तलवार आँखें| अली सरदार जाफ़री

  • 31st Aug 2025

    उड़ते हुए भौँरों की तरह!

    मौसम-ए-गुल में वो उड़ते हुए भौँरों की तरह,ग़ुंचा-ए-दिल पे वो करती हुई यलग़ार आँखें| अली सरदार जाफ़री

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