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वो छुपा ले गया मुझे!
पलकों की ओट में वो छुपा ले गया मुझे,या’नी नज़र नज़र से बचा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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हुस्न को सच लिक्खूंगा!
ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत,सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा। शहरयार
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सोचता रोज़ हूँ मैं!
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा। शहरयार
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औरत!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। देवताले जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की ये कविता- वह औरतआकाश और पृथ्वी के बीचकब से कपड़े पछीट रही है, पछीट रही है शताब्दियों सेधूप…
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तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!
देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा। शहरयार
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बड़ी तेज़ हवा है!
मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर,बड़ी तेज़ हवा है सर्दी आज ग़ज़ब की है। शहरयार
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तिरी दीद से आँखें!
तिरी दीद से आँखें जी भर के सैराब हुईं,किस रोज़ हुआ था ऐसा बात ये कब की है। शहरयार