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मुद्दत के बा’द ‘नूर’!
मुद्दत के बा’द ‘नूर’ हँसी लब पे आई है,वो अपना हम-ख़याल बना ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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बहा ले गया मुझे!
तूफ़ाँ के बा’द मैं भी बहुत टूट सा गया,दरिया फिर अपने रुख़ पे बहा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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झोंका हवा का आया!
धरती का ये सफ़र मिरा जिस दिन हुआ तमाम,झोंका हवा का आया उड़ा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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उतारी जाए!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी की एक कवि ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। विराट जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रसेन विराट जी की ये ग़ज़ल – अब हथेली न पसारी जाए.धार पर्वत से उतारी जाए. अपनी जेबो में भरे जो पानीउसकी…
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बस तेरा प्यार था जो!
आवागमन की क़ैद से क्या छूटता कभी,बस तेरा प्यार था जो छुड़ा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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इक जान-दार लाश!
इक जान-दार लाश समझिए मिरा वजूद,अब क्या धरा है कोई चुरा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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हो वापसी अगर तो!
हो वापसी अगर तो इन्हें रास्तों से हो,जिन रास्तों से प्यार तिरा ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर
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वो मना ले गया मुझे!
अब उस को अपनी हार कहूँ या कहूँ मैं जीत,रूठा हुआ था मैं वो मना ले गया मुझे| कृष्ण बिहारी नूर