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ख़्वाब राएगाँ निकले!
हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे,मलाल क्यूँ हो कि कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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अरमाँ अभी कहाँ!
फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है,अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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अगर सदा न उठे!
बहुत घुटन है कोई सूरत-ए-बयाँ निकले,अगर सदा न उठे कम से कम फ़ुग़ाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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बेबीलोन के खण्डहरों में!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय जगदीश चतुर्वेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। चतुर्वेदी जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। आप हिंदी में अकविता आंदोलन के प्रवर्तक थे। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जगदीश चतुर्वेदी जी की यह कविता – बेबीलोन जाते हुएफरात नदी का चौड़ा पुल पार…