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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Apr 2025

    हम अपने-आप की!

    हम अपने-आप की पहचान ले के आए हैं, नए सुख़न नए इम्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    मिज़ाज-ए-ईद भी !

    मिज़ाज-ए-ईद भी समझा तुझे भी पहचाना,बस एक अपने ही जी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    जो आइने से मिला!

    जो आइने से मिला आइने पे झुँझलाया,किसी ने अपनी कमी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    तमाम ‘उम्र गुज़ारी!

    तमाम ‘उम्र गुज़ारी ख़याल में जिस के,तमाम ‘उम्र उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    कि फिर किसी ने!

    सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम,कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    मिरी अना ने किसी!

    कचोके देती रहीं ग़ुर्बतें मुझे लेकिन,मिरी अना ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    किसी ने मुड़ के!

    क़लक़* था सब को समुंदर की बे-क़रारी का,किसी ने मुड़ के नदी की तरफ़ नहीं देखा| *अफसोस मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    सहर ने अंधी गली!

    सहर ने अंधी गली की तरफ़ नहीं देखा,जिसे तलब थी उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    घन का गिरि!

    आज मैं हिंदी के विख्यात समीक्षक और कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। नामवर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत– घन का गिरि, शिखर स्थित रवि             यह सरि वेला !वन – उपवन सुरभि सजग              मलय वलय बेला !…

  • 16th Apr 2025

    कोई तराना कोई!

    बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास,कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा| अली सरदार जाफ़री

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