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तमाम ‘उम्र गुज़ारी!
तमाम ‘उम्र गुज़ारी ख़याल में जिस के,तमाम ‘उम्र उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली
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मिरी अना ने किसी!
कचोके देती रहीं ग़ुर्बतें मुझे लेकिन,मिरी अना ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली
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किसी ने मुड़ के!
क़लक़* था सब को समुंदर की बे-क़रारी का,किसी ने मुड़ के नदी की तरफ़ नहीं देखा| *अफसोस मंज़र भोपाली
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घन का गिरि!
आज मैं हिंदी के विख्यात समीक्षक और कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। नामवर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत– घन का गिरि, शिखर स्थित रवि यह सरि वेला !वन – उपवन सुरभि सजग मलय वलय बेला !…
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कोई तराना कोई!
बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास,कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा| अली सरदार जाफ़री