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कहते हैं मोहब्बत!
कहते हैं मोहब्बत फ़क़त उस हाल को ‘बिस्मिल’,जिस हाल को हम उन से भी अक्सर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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उषस(तीन)
आज मैं हिंदी के विख्यात कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की भोर पर लिखी एक और कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता– थके गगन में उषा-गान !! तम की अँधियारी अलकों मेंकुंकम की पतली-सी रेखदिवस-देवता का लहरों…
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मुँह पर नहीं कहते!
क्या अहल-ए-जहाँ तुझ को सितमगर नहीं कहते,कहते तो हैं लेकिन तिरे मुँह पर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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हर बार नए शौक़ से!
हर बार नए शौक़ से है अर्ज़-ए-तमन्ना,सौ बार भी हम कह के मुकर्रर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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रिंदों को डरा सकते हैं!
रिंदों को डरा सकते हैं क्या हज़रत-ए-वाइ’ज़,जो कहते हैं अल्लाह से डर कर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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बुत-ख़ाने में काफ़िर!
का’बे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर,बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़िर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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उसे सर नहीं कहते!
सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते,हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी
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जो तेरे शहर में!
उन्हीं पे सारे मसाइब* का बोझ रक्खा है,जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं|*मुसीबतें मंज़र भोपाली