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इंतिज़ार करते रहे!
वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी,हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रह-ए-ख़िज़ाँ में !
रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे,शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मानी नहीं जाती!
ब-जुज़ दीवानगी वाँ और चारा ही कहो क्या है,जहाँ अक़्ल ओ ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहुत जानी हुई सूरत!
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से,बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हैरानी नहीं जाती!
कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा,मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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घोड़ों का अर्जीनामा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। प्रेम जी बहुत डूबकर अपने गहन संवेदन भरे गीत प्रस्तुत करते थे, मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनके मुख से कुछ गीत सुनने का अवसर मिला। लीजिए आज प्रस्तुत…
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मुद्दत के बा’द ‘नूर’ !
मुद्दत के बा’द ‘नूर’ हँसी लब पे आई है,वो अपना हम-ख़याल बना ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
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तूफ़ाँ के बा’द मैं भी!
तूफ़ाँ के बा’द मैं भी बहुत टूट सा गया,दरिया फिर अपने रुख़ पे बहा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर