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अधूरी समाप्तियां !
आज मैं विख्यात गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– सब समाप्त हो जाने के पश्चात भीकुछ ऐसा हैजो कि अनहुआ रह जाता है चलते-चलते राह कहीं चुक…
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हुई है शाम तो!
हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू, कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़
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कितना अच्छा था कि!
कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’,ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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सामने उम्र पड़ी है!
सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की,वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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अब तिरे ज़िक्र पे !
अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं,कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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लोग उजड़ जाते हैं!
ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने,लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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हम भी उलझे थे!
नौ-गिरफ़्तार-ए-वफ़ा सई-ए-रिहाई है अबस,हम भी उलझे थे बहुत दाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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यह फागुनी हवा!
आज मैं विख्यात आंचलिक कथाकार और श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। रुणु जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता– यह फागुनी हवामेरे दर्द की दवाले आई…ई…ई…ईमेरे दर्द की दवा! आंगन…
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हम अपने राज़ पे!
हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे,हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़