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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Jul 2025

    यदि – रुड्यार्ड किप्लिंग

    आज, एक बार फिर मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया…

  • 8th Jul 2025

    उसकी फ़ुर्क़त में हमें!

    उस की फ़ुर्क़त में हमें चर्ख़-ए-सितमगार ने आह,ये रुलाया, ये रुलाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    इस तमाशे से दिखाया!

    बाम पर चढ़ के तमाशे को हमें हुस्न अपना,इस तमाशे से दिखाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    तीर इस ढब से!

    उस की दुज़्दीदा निगह ने मिरे दिल में छुप कर,तीर इस ढब से लगाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    मिरे दिल ने हँस कर!

    ज़ख़्म उस तेग़-ए-निगह का मिरे दिल ने हँस कर,इस मज़े-दारी से खाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    नाज़ उठाने में!

    नाज़ उठाने में जफ़ाएँ तो उठाईं लेकिन,लुत्फ़ भी ऐसा उठाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    इश्क़ फिर रंग वो!

    इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने है,दिल का ये रंग बनाया है कि जी जाने है| नज़ीर अकबराबादी

  • 8th Jul 2025

    ‘नज़ीर’ अपनी दुनिया!

    ‘नज़ीर’ अपनी दुनिया तो अब तक यही है,शराब आफ़्ताबी फ़ज़ा माहताबी| नज़ीर बनारसी

  • 8th Jul 2025

    कहीं तुम को छू ले!

    ज़रा मुझ से बचते रहो पारसाओ, कहीं तुम को छू ले न मेरी ख़राबी| नज़ीर बनारसी

  • 8th Jul 2025

    पलकों के साए में!

    घनी मस्त पलकों के साए में नज़रें,बहकते हुए मय-कदों में शराबी| नज़ीर बनारसी

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