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पुराने वक़्तों का है!
पुराने वक़्तों का है क़स्र* ज़िंदगी मेरी,तुम्हारा नाम भी इस में कहीं लिखा होगा| *किला शीन काफ़ निज़ाम
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वही न मिलने का ग़म !
वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा,मैं जानता हूँ मुझे उस ने क्या लिखा होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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लड़की सियानी और!
बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया,टूटे-फूटे घर में इक लड़की सियानी और है| मुनव्वर राना
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फिर वही उक्ताहटें!
फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में,उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है| मुनव्वर राना
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ख़ुश्क पत्ते आँख में!
ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह,दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है| मुनव्वर राना
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ख़ामुशी कब चीख़!
ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है,ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है| मुनव्वर राना
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थोड़ा सा पानी और है!
हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है,इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है| मुनव्वर राना
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आज मानव का!
आज मैं विख्यात उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की यह कविता – आज मानव का सुनहला प्रात है,आज विस्मृत का मृदुल आघात है;आज अलसित और मादकता-भरे,सुखद सपनों से शिथिल…
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मेरी आँखें मिरी!
आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र, मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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कुछ उमीदें भी!
टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में,कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना