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इन ख़ाली कमरों में!
मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा,इन ख़ाली कमरों में ‘नासिर’ अब शम्अ जलाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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जान-ए-ग़ज़ल ही!
अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं,ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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वो शहर में था तो!
वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था,अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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धूप उसी के साथ गई!
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई,इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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फेसबुक पर कविताएं!
मैं काफी वर्षों से अपना ब्लॉग लिख रहा हूँ, जिस पर मैंने शुरुआत अपने जीवन के विभिन्न अनुभवों को क्रमवार लिखने से की थी, हाँ कविता मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग रही है अतः मैंने कविता को भरपूर इसमें स्थान दिया है। अपनी ब्लॉग पोस्ट्स का लिंक मैं शुरू से ही अपने फेसबुक पृष्ठ…
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ये मुलाकातें!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता – बीच-बीच कीये मुलाक़ातेंमेरी उम्र के पन्नों पर ऐसे ही सजी हैंजैसे बच्चे अपनी पोथी…
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नए कपड़े बदल कर!
नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए, वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी