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कई झूटे इकट्ठे हों!
यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है,कई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है| हसीब सोज़
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ये शोर बनेगा किसी!
ये शोर बनेगा किसी बेकस का तराना, दुनिया मिरी ज़ंजीर से हैरान अभी है। क़मर अब्बास क़मर
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इस शहर में कुछ!
इस शहर में कुछ लोगों से पहचान अभी है,या’नी कि मिरे होने का इम्कान अभी है। क़मर अब्बास क़मर
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मैं रहा हूँ परिचित, रात से!
आज एक बार फिर मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। (अनुवाद हेतु मूल रचनाएं मैं सामान्यतः ‘Poemhunter.com’ से लेता हूँ।) पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- मैं रहा हूँ – परिचित रात से।मैं बरसात में निकला…
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पहाड़ पेड़ नदी !
पहाड़ पेड़ नदी साथ दे रहे हैं मिरा,ये तेरी ओर मिरा आख़िरी सफ़र तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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कि तेरे पाँव के नीचे!
बुलंद होते हुए देख ले ज़मीं की तरफ़,कि तेरे पाँव के नीचे किसी का सर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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मैं इस ज़मीं का!
पलटने वाले परिंदों पे बद-हवासी है,मैं इस ज़मीं का कहीं आख़िरी शजर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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दश्त मेरा घर तो नहीं!
मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं,गुमाँ गुज़रता है ये दश्त मेरा घर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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कंगन दिलाने के लिए!
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी