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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th May 2025

    उलझे धागों को!

    उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है,नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है। शंभुनाथ तिवारी

  • 30th May 2025

    है अजब फ़ैसले का!

    है अजब फ़ैसले का सहरा भी,चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    जिस तरह बहलते हैं!

    मैं उसी तरह तो बहलता हूँ,और सब जिस तरह बहलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    बनो रंग तुम बनो!

    तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू,हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    है उसे दूर का सफ़र!

    है उसे दूर का सफ़र दर-पेश,हम सँभाले नहीं सँभलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    हम उस से जलते हैं!

    क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में,जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    घर से कम निकलते!

    है वो जान अब हर एक महफ़िल की,हम भी अब घर से कम निकलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    देखने वाले हाथ मलते!

    हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद,देखने वाले हाथ मलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    ठीक है ख़ुद को हम!

    ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं,शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं| जौन एलिया

  • 30th May 2025

    बह नहीं जाना लहर में!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – यह मधुर मधुवंत बेलामन नहीं है अब अकेलास्वप्न का संगीत कंगन की तरह खनका सांझ…

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