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दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द!
क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए,दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई| असद भोपाली
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मेरे देश की आँखें!
एक बार फिर से आज मैं, हिंदी साहित्य की हर विधा में अपनी अमिट छप छोडने वाले, कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। अज्ञेय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता–…