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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jul 2025

    दोस्त पुराना लिख्खा!

    क्या ख़बर उस को लगे कैसा कि अब के हम ने,अपने इक ख़त में उसे दोस्त पुराना लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 25th Jul 2025

    काग़ज़ पे घरौंदा!

    सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है,इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 25th Jul 2025

    रात की पलकों पे!

    दिन के माथे पे तो सूरज ही लिखा था तू ने,रात की पलकों पे किस ने ये अँधेरा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 25th Jul 2025

    कहाँ का लिख्खा!

    शहर भी लिक्खा मकाँ लिक्खा मोहल्ला लिखा,हम कहाँ के थे मगर उस ने कहाँ का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 25th Jul 2025

    बिखराव बहुत से होते हैं!

    अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- मिले प्रेम तो गीत प्रेम के लिख लेना, यूं लिखने को भाव बहुत से होते हैं। ऐसे भी हैं जिन्हें प्रेम किंचित न मिला, खूब व्यंग्य कविता में करते रहे सदा, कुछ हैं तीरन्दाज ओज से भरे हुए, युद्ध ठानते रहे मित्र वे यदा-कदा, करना हो…

  • 24th Jul 2025

    तुझे क्या क्या लिख्खा!

    कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा,अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या क्या लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 24th Jul 2025

    जैसी गुज़र गई!

    कुछ दिन की और कश्मकश-ए-ज़ीस्त है ‘असर’,अच्छी बुरी गुज़रनी थी जैसी गुज़र गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    कहने की बात!

    अब हाथ मलते हैं कि दम-ए-अर्ज़-ए-माजरा,कहने की बात ध्यान से कैसी उतर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    सीने में और ताब दे!

    सीने में और ताब दे शोले को शौक़ के,सज्दा ग़लत अगर न तजल्ली निखर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    फूलों की गोद!

    क्या जाने आँख मार के क्या कह गई शफ़क़,फूलों की गोद मौज-ए-नसीम आ के भर गई| असर लखनवी

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