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दोस्त पुराना लिख्खा!
क्या ख़बर उस को लगे कैसा कि अब के हम ने,अपने इक ख़त में उसे दोस्त पुराना लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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काग़ज़ पे घरौंदा!
सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है,इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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रात की पलकों पे!
दिन के माथे पे तो सूरज ही लिखा था तू ने,रात की पलकों पे किस ने ये अँधेरा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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कहाँ का लिख्खा!
शहर भी लिक्खा मकाँ लिक्खा मोहल्ला लिखा,हम कहाँ के थे मगर उस ने कहाँ का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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बिखराव बहुत से होते हैं!
अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- मिले प्रेम तो गीत प्रेम के लिख लेना, यूं लिखने को भाव बहुत से होते हैं। ऐसे भी हैं जिन्हें प्रेम किंचित न मिला, खूब व्यंग्य कविता में करते रहे सदा, कुछ हैं तीरन्दाज ओज से भरे हुए, युद्ध ठानते रहे मित्र वे यदा-कदा, करना हो…
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तुझे क्या क्या लिख्खा!
कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा,अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या क्या लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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जैसी गुज़र गई!
कुछ दिन की और कश्मकश-ए-ज़ीस्त है ‘असर’,अच्छी बुरी गुज़रनी थी जैसी गुज़र गई| असर लखनवी