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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Aug 2025

    तेरा मक़्सद है क्या!

    तेरा मक़्सद है क्या मैं समझ जाऊँगा,कोई मौसम ही की बात प्यारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    आँख की उस बदन पर!

    आँख की उस बदन पर लकीरें खिंचीं,हर ग़ज़ल से नए इस्तिआ’रे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    अपने सितारे उठा!

    आख़िरी है सफ़र वो सुबुक-सर चले,उस के दामन से अपने सितारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    रौशनी का वो कैसा!

    रौशनी का वो कैसा अजब शोर था, इस किनारे हुआ उस किनारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    ज़िंदगी के पुराने !

    ऐसा लगता है दोहरा रहा हूँ मैं कुछ,ज़िंदगी के पुराने शुमारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    रास्ता नहीं लगता!

    आज प्रस्तुत हैं मेरी एक ग़ज़ल के कुछ शेर, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- यहाँ कहीं भी किसी का पता नहीं लगता,ये रास्ता तो मुझे रास्ता नहीं लगता। सुना है लोग बहुत से इधर से गुज़रे हैं,कोई निशान, कोई नक़्श-ए-पा नहीं लगता। कहाँ की मौज, कहाँ का सफर, कहाँ मंज़िलकोई बहाव, कोई सिलसिला नहीं लगता।…

  • 10th Aug 2025

    उँगलियों से शरारे उठा!

    अपनी पलकों से उस के इशारे उठा,ओस की उँगलियों से शरारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 10th Aug 2025

    सोता होगा मेरा चाँद!

    रात के शायद एक बजे हैं,सोता होगा मेरा चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    इश्क़ में सच्चा चाँद!

    सहरा सहरा भटक रहा है,अपने इश्क़ में सच्चा चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    हिज्र का चाँद!

    हाथ हिला कर रुख़्सत होगा,उस की सूरत हिज्र का चाँद| परवीन शाकिर

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