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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Aug 2025

    तू मिरे साथ अगर है!

    तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    तिरे ज़ख़्मों के निशाँ!

    ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    अभी दुनिया हमें!

    हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता, अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    जैसे सावन के महीने में!

    ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी,जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    तू जहाँ होता है!

    सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है,तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    उसे पहली कमाई देते!

    सिसकियाँ उस की न देखी गईं मुझ से ‘रा’ना’,रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2025

    बंदिशें रोने लगीं!

    साथ रहने से भी खिल जाते हैं रिश्तों के कँवल,बंदिशें रोने लगीं मुझ को रिहाई देते| मुनव्वर राना

  • 17th Aug 2025

    उड़ जा प्यारी चिडिया।

    आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बहुत शिकारी घूम रहे हैं,बचकर उड़ जा, प्यारी चिड़िया। बहुत अटपटा ये मौसम हैहर कोई खुद में ही गुम हैस्वार्थ सभी के ऊपर भारीहत्या तक की है तैयारी किस पर यहाँ भरोसा तुझकोसबके हाथ दुधारी, चिड़िया। झूठा रिश्ता लोग दिखातेझट से अनजाने बन जाते,जहाँ लाभ…

  • 17th Aug 2025

    घर में डरते थे!

    कहीं बे-नूर न हो जाएँ वो बूढ़ी आँखें,घर में डरते थे ख़बर भी मिरे भाई देते| मुनव्वर राना

  • 17th Aug 2025

    दर्द-भरा गीत थे हम!

    सूने पनघट का कोई दर्द-भरा गीत थे हम,शहर के शोर में क्या तुझ को सुनाई देते| मुनव्वर राना

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