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जीना भी सिखा देते हैं!
हादसे जान तो लेते हैं मगर सच ये है,हादसे ही हमें जीना भी सिखा देते हैं| अजय सहाब
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हम को सज़ा देते हैं!
जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं,जाने किस बात की वो हम को सज़ा देते हैं| अजय सहाब
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आज बचपन कहीं!
आज बचपन कहीं बस्तों में ही उलझा है ‘सहाब’,फिर वो तितली को पकड़ना वो उड़ाना आए| अजय सहाब
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स्कूल से छुट्टी जो मिले!
आह सहसा कभी स्कूल से छुट्टी जो मिले,चीख़ कर बच्चों का वो शोर मचाना आए| अजय सहाब
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काश उस्तादों को!
हम को क़ुदरत ही सिखा देती है कितनी बातें,काश उस्तादों को क़ुदरत सा पढ़ाना आए| अजय सहाब
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रूठूँ तो मनाना आए!
काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी,जब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आए| अजय सहाब
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हाथों में ख़ज़ाना आए!
काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर,काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए| अजय सहाब
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अवशिष्ट!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी लेखक, कवि और संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह नवगीत- दुख आयाघुट घुटकरमन-मन मैं खीज गया सुख आयालुट लुटकरकन…
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ज़िंदगी उम्र में कुछ!
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना