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गूँज रही हैं पल पल में!
आज पता क्या कौन से लम्हे कौन सा तूफ़ाँ जाग उठे,जाने कितनी दर्द की सदियाँ गूँज रही हैं पल पल में| जाँ निसार अख़्तर
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प्यार की यूँ हर बूँद!
प्यार की यूँ हर बूँद जला दी मैं ने अपने सीने में,जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पी कर बोतल में| जाँ निसार अख़्तर
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जैसे कोई दीप जला हो!
गोरी इस संसार में मुझ को ऐसा तेरा रूप लगे,जैसे कोई दीप जला हो घोर अँधेरे जंगल में| जाँ निसार अख़्तर
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प्रारंभ- रवींद्रनाथ ठाकुर – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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कितनी मिलती संदल से!
सुब्ह नहाने जूड़ा खोले नाग बदन से आ लिपटें,उस की रंगत उस की ख़ुश्बू कितनी मिलती संदल से| जाँ निसार अख़्तर
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प्यासे प्यासे नैना उस के!
प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या,तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में| जाँ निसार अख़्तर
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आज ज़रा ललचाई नज़र!
आज ज़रा ललचाई नज़र से उस को बस क्या देख लिया,पग-पग उस के दिल की धड़कन उतरी आए पायल में| जाँ निसार अख़्तर
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भली हो या बुरी हो!
अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- क्षीण होती जा रही जब आस्थाओं की धुरी हो, प्रेरणा तो ज़िंदगी देगी, भली हो या बुरी हो| हम नदी के बांध सेज्यादा प्रभावी हैं, रोकते ही नहीं पानीसुखा देते हैं, बीतनी है ज़िंदगीसुख हो, भले दुख हो, मुस्कुराकर ज़िंदगी को छका देते हैं, गूंजती ही…
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मेरा 75 वां जन्मदिन
कल मेरा 75 वां जन्मदिन था, इस अवसर पर मेरी पत्नी के अलावा मेरे तीनों बेटे साथ थे, एक के साथ तो हम ग़ोवा में रहते ही हैं, मेरे एक बेटा बहू बंगलौर से आए और बड़ा बेटा लंदन से भी आया, जिनकी हमें पहले से जानकारी नहीं थी। मेरे बड़े बेटे ने एक और…
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एक तो नैनाँ कजरारे!
एक तो नैनाँ कजरारे और तिस पर डूबे काजल में,बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में| जाँ निसार अख़्तर