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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Sep 2025

    तितली के पर जैसे!

    रस्ते में मिल जाते हैं, तितली के पर जैसे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    भाग रहे हैं दुनिया में!

    भाग रहे हैं दुनिया में,पाँव को सर पे रक्खे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    मर जाते हैं अच्छे लोग!

    कम-उम्री में सुनते हैं,मर जाते हैं अच्छे लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    अंधे गूँगे बहरे!

    अंधे गूँगे बहरे लोग,उजले कपड़े मैले लोग| मालिकज़ादा जावेद

  • 11th Sep 2025

    सुना है कि मंज़िल!

    मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे,सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    अरे ओ जफ़ाओं पे!

    अरे ओ जफ़ाओं पे चुप रहने वालो,ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    नया है ज़माना!

    चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं,नया है ज़माना नई रौशनी है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 11th Sep 2025

    रामकली!

    आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कब उसके यौवन की धूप ढलीइतना भी नहीं जाने रामकली। सुबह सवेरे हीउठ जाती हैझाडू-पोंछा खूबलगाती है जब तब खाती डांटखूब पगली। धरम-करम कोखूब मानती हैसारे तिथि-त्योहारजानती है, जो भी करते,करते राम भली। मुद्दत से वोसेवक है घर कीसुख की दुआमांगती हैसबकी यही आस्था है…

  • 10th Sep 2025

    वो मौजूद हैं और!

    वो मौजूद हैं और उन की कमी है,मोहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमी है| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 10th Sep 2025

    जिसे इश्क़ कहते हैं!

    खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है,जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है| ख़ुमार बाराबंकवी

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