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रंग है न पानी है!
‘कैफ़’ तुझ को दुनिया ने क्या से क्या बना डाला,यार अब तिरे मुँह पर रंग है न पानी है| कैफ़ भोपाली
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जॉर्जेट के पल्ले सी!
आज एक बार फिर से मैं एक पुरानी पोस्ट दोहरा रहा हूँ। बहुत बार लोग कविता लिखते हैं मौसम पर, कुछ कविताएं बहुत अच्छी भी लिखी जाती हैं। तुलसीदास जी ने, जब रामचंद्र जी, माता सीता की खोज में लगे थे, उस समय ऋतुओं के बदलने का बहुत सुंदर वर्णन किया है। पूरा मनोविज्ञान भरा…
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पूछते हो क्या बाबा!
पूछते हो क्या बाबा क्या हुआ दिल-ए-ज़िंदा,वो मिरा दिल-ए-ज़िंदा आज आँ-जहानी है| कैफ़ भोपाली
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आज मेरे अश्कों का!
शायद उन के दामन ने पोंछ दीं मिरी आँखें,आज मेरे अश्कों का रंग ज़ाफ़रानी है| कैफ़ भोपाली
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आँधियाँ भी पगली हैं!
घास के घरौंदे से ज़ोर-आज़माई क्या,आँधियाँ भी पगली हैं बर्क़ भी दिवानी है| कैफ़ भोपाली
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दिल पे हुक्मरानी है!
इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है,दिल नहीं मिरा गोया उन की राजधानी है| कैफ़ भोपाली
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मुस्कुरा के देख ज़रा!
तिरी नज़र से है रिश्ता मिरे गिरेबाँ का,किधर है मेरी तरफ़ मुस्कुरा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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मिले तो तू ही मिले!
मिले तो तू ही मिले और कुछ क़ुबूल नहीं,जहाँ में हौसले अहल-ए-वफ़ा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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वजूद-ए-इश्क़ की!
वजूद-ए-इश्क़ की तारीख़ का पता तो चले,वरक़ उलट के तू अर्ज़ ओ समा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में बंदिनी फिल्म के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे शैलेंद्र जी ने लिखा था और इसका संगीत सचिन देव बर्मन जी ने तैयार किया था। प्रस्तुत है यह गीत, आशा है आपको पसंद आएगा- ओ जाने वाले हो…