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उन की ख़ुशी मुझे!
राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों ‘शकील’,हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे| शकील बदायूनी
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इक शय मिली है!
पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद,इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे| शकील बदायूनी
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यूँ दीजिए फ़रेब!
यूँ दीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर,मैं ज़िंदगी को याद करूँ ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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यूँ बन रहा हूँ जैसे!
रोने पे अपने उन को भी अफ़्सुर्दा देख कर,यूँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे| शकील बदायूनी
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न ग़म की ख़ुशी मुझे!
अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे,बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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फिर आया हिंदी दिवस!
और आज आ गया है 14, सितंबर अर्थात ‘हिंदी दिवस’। इस दिवस की शुभकामनाएं, यदि इस दिन से हिंदी को कुछ मिला है! एक घोषणा हुई थी ‘हिंदी’ को राजभाषा बनाने, ढेर सारे किंतु-परंतु के साथ। बस यही है कि रिपोर्टें तैयार होती रहेंगी और हिंदी जहाँ थी, वहीं है। हिंदी को अगर आगे बढ़ाया…
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फिर से देखेंगे हम सपने!
आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- फिर से देखेंगे हम सपने! सपनीला कुछ पास नहीं हैदिखती कोई आस नहीं हैकिंतु हौसला तो कायम हैबस मन में मधुमास नहीं है। मदिर कल्पना के ये पंछीआतुर एक करिश्मा रचने। सपनों की तो बात निराली, खूब फुदकते डाली-डालीचाहे शाखें सूख रही होंया फिर छाई…
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पुरानी शराब पीता हूँ!
पुराने चाहने वालों की याद आने लगे,इसी लिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ। हसरत जयपुरी