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अश्कों की लकीर!
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर,सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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तू ने पुकारा ही न हो!
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी,चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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प्यार लेकिन जो किया!
यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत,प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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इतने यक़ीं से हमने!
कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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दास्ताँ अपनी सुनाई है!
जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है,दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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दीवाना बने फिरते थे!
वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे,सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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कितनी शिकनों को!
हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हम ने,कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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बात करेंगे हम तो मन की!
आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बात करेंगे हम तो मन की गीत कहो, नवगीत कहो तुम, या प्रलाप की रीत कहो तुम, हम को कहते ही रहना है, धारा सा अविरल बहना है। हम मन की गिरहें खोलेंगे धूप दिखाएंगे जीवन की। मन ही है, संपत्ति हमारी सहता सभी विपत्ति…
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उन की ख़ुशी मुझे!
राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों ‘शकील’,हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे| शकील बदायूनी