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शायद उसे भी ले गए!
शायद उसे भी ले गए अच्छे दिनों के क़ाफ़िले,इस बाग़ में इक फूल था तेरी तरह हँसता हुआ| बशीर बद्र
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लफ़्ज़ ग़ुंचे की तरह!
अब इन दिनों मेरी ग़ज़ल ख़ुशबू की इक तस्वीर है,हर लफ़्ज़ ग़ुंचे की तरह खिल कर तिरा चेहरा हुआ| बशीर बद्र
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आँखें मिरी भीगी हुई!
शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ,आँखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ| बशीर बद्र
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चाँद में कैसे हुई क़ैद!
चाँद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी,ये कहानी किसी मस्जिद की अज़ाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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रावण और विभीषण!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना समझाओगे विभीषण क्या मान जाएगा दशानन। कोई लाभ नहीं है मित्र जिसके कांधों पर दस सिर हैं ऐश्वर्य, अहंकार, सामाजिक प्रतिष्ठा वह कैसे झुकेगा किसी के सामने भले ही वह ईश्वर ही क्यों न हो। खुद तुम घर के भेदी कहलाओगे, करुणा…
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क्या ज़रूरी है कि!
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए,मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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वैसी तो दुनिया नहीं!
जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं,दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली