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ज़िंदगी रोज़ तो!
चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें, ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही| निदा फ़ाज़ली
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दिन सलीक़े से उगा!
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही,दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही| निदा फ़ाज़ली
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सितारे ये ख़बर लाए!
सितारे ये ख़बर लाए कि अब वो भी परेशाँ हैं,सुना है उन को नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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घटा जो दिल से उठती
घटा जो दिल से उठती है मिज़ा तक आ तो जाती है, मगर आँख उस को बरसाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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नज़र वो साफ़ अब !
तिरी तस्वीर जो टूटे हुए दिल का सहारा थी,नज़र वो साफ़ अब आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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जिसे अपना समझता!
जिसे अपना समझता था वो आँख अब अपनी दुश्मन है,कि ये रोने से बाज़ आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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सितारो तुम को नींद !
तुम्हीं तो हो शब-ए-ग़म में जो मेरा साथ देते हो,सितारो तुम को नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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हम जानें या राम!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में अपने एक अग्रज स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी का मार्मिक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- कैसे बीते दिवस हमारे, हम जानें या राम। आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद।
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जो ख़्वाबों में मिरे!
जो ख़्वाबों में मिरे आ कर तसल्ली मुझ को देती थी,वो सूरत अब नज़र आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी
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अकेला पा के मुझको!
अकेला पा के मुझ को याद उन की आ तो जाती है,मगर फिर लौट कर जाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ| अनवर मिर्ज़ापुरी