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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Sep 2025

    जब किसी बच्चे ने!

    यूँ लगा जैसे कोई इत्र फ़ज़ा में घुल जाए,जब किसी बच्चे ने क़ुरआँ की तिलावत की है| राहत इंदौरी

  • 20th Sep 2025

    जब कभी फूलों ने!

    जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है,पत्ती पत्ती ने हवाओं से शिकायत की है| राहत इंदौरी

  • 20th Sep 2025

    मिरे फ़ैसले बदलती हैं!

    ‘वसीम’ आओ इन आँखों को ग़ौर से देखो,यही तो हैं जो मिरे फ़ैसले बदलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    खंडहर गीत

  • 20th Sep 2025

    कि इतनी क़ुर्बतें!

    बहुत क़रीब हुए जा रहे हो सोचो तो,कि इतनी क़ुर्बतें जिस्मों से कब सँभलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    कहाँ की शम’एँ हैं!

    हमारे बारे में लिखना तो बस यही लिखना,कहाँ की शम’एँ हैं किन महफ़िलों में जलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    मिरी हयात से शायद!

    मिरी हयात से शायद वो मोड़ छूट गए,बग़ैर सम्तों* के राहें जहाँ निकलती हैं|*Directions वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    सफ़र पे आज वही!

    सफ़र पे आज वही कश्तियाँ निकलती हैं,जिन्हें ख़बर है हवाएँ भी तेज़ चलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    जाने किस हाल में!

    आरज़ूओं के बहुत ख़्वाब तो देखो हो ‘वसीम’, जाने किस हाल में बे-दर्द ज़माना रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2025

    गीत अलग ही सुर में!

    आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत अलग ही सुर में गाया जा सकता था, पीड़ा का एहसास दबाया जा सकता था। मुख जब दंतविहीन हुआ तब ज्ञान मिला येकोई और जुगाड़ लगाया जा सकता है। दावत खाकर घर आए तब सोचा हमने,छोड़ा बहुत, और कुछ खाया जा सकता था। छूट…

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