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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Jan 2018

    137. गीत उगने दो!

    आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है- मौन यूं कवि मत रहो, अब गीत उगने दो। अनुभव की दुनिया के अनगिनत पड़ाव, आसपास से गुज़र गए, झोली में भरे कभी पर फिर अनजाने में, सभी पत्र-पुष्प झर गए, करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को- अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो। खुद से खुद…

  • 4th Jan 2018

    136. सिरजन की प्यास मेरे मन में उतार दे!

    एक गीत और आज  शेयर कर रहा हूँ, यह मां शारदे से प्रार्थना के रूप में है। ये गीत उन दिनों लिखे गए थे जब मैं दिल्ली छोड़ चुका था, दिल्ली में मेरे पास गोष्ठियों आदि में नई रचनाएं सुनने और शेयर करने की सुविधा उपलब्ध थी, जबकि बाद में जहाँ था, वहाँ ऐसी कविताएं…

  • 3rd Jan 2018

    135. गीतों में कहनी थीं तुमसे कुछ बातें!

    चलिए अब फिर से, जो काम बीच में छोड़ दिया था अपनी अधबुनी, अधखुली कवित्ताओं को शेयर करने का, वो काम फिर से शुरू करता हूँ। आज की कविता गीत के रूप में है-   गीतों में कहनी थीं, तुमसे कुछ बातें आओ कुछ समय यहीं साथ-साथ काटें। अपनी तुतली ज़ुबान गीतमयी मुद्दत से बंद…

  • 2nd Jan 2018

    134- मैं, शक्तिमान !

    नया साल भी शुरु हो गया जी। ज़िंदगी की रफ्तार और महानगरों में लगने वाले जाम इसी तरह चलते रहेंगे, क्योंकि ऐसा लगता है कि जितने फ्लाई-ओवर बनते जा रहे हैं, उतना ही ‘जाम’ भी बढ़ता जाता है। हमारे देश के साथ एक और स्थाई समस्या है, हमारे देश से ही अलग होकर आतंकवाद की…

  • 1st Jan 2018

    133. लो जी, आ गया नया साल-2018.

    आखिर आ ही गया नया साल! नववर्ष का शिशु, धरती पर अपने नन्हे पांव रख चुका है, इसकी अगवानी कीजिए। आज ज्ञान बघारने का समय नहीं है, यह सोचें कि क्या है जो पिछले वर्ष चाहकर भी नहीं हासिल कर पाए, और इरादा बनाएं वह उपलब्धि इस वर्ष प्राप्त करने की! किसी कवि की पंक्तियां…

  • 31st Dec 2017

    132. मुबारक़ हो नया साल!

    कुछ दिन से अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा हूँ, ऐसी कविताएं जिन्हें पहले कहीं सुनाया, दिखाया या छपवाया नहीं। ये स्टॉक अभी खत्म नहीं हुआ, आगे भी जारी रहेगा, लेकिन इस बीच ये नया साल भी तो आ गया न! तो आज साबिर दत्त जी की ये रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने…

  • 30th Dec 2017

    131. जवां रहो!

    अब जब पुरानी कविताएं शेयर करने का सिलसिला चल निकला है तो लीजिए, मेरी एक और पुरानी कविता प्रस्तुत है- सपनों के झूले में झूलने का नाम है- बचपन, तब तक-जब तक कि इन सपनों की पैमाइश जमीन के टुकड़ों, इमारत की लागत और बैंक खाते की सेहत से न आंकी जाए। जवान होने का…

  • 29th Dec 2017

    130. बचपन

    मेरी कुछ पुरानी कविताओं को शेयर करने के क्रम में, प्रस्तुत है आज की कविता- बचपन बचपन के बारे में, आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे, है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन एक सुनहरा सपना है, जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है। कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे…

  • 28th Dec 2017

    129. मन के सुर राग में बंधें!

    पुरानी कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना यानी ‘पास्ट इंपर्फेक्ट’ कविताओं में से, एक कविता आज प्रस्तुत है- मुझमें तुम गीत बन रहो मुझमें तुम गीत बन रहो, मन के सुर राग में बंधें। वासंती सारे सपने पर यथार्थ तेज धूप है, मन की ऊंची उड़ान है नियति किंतु अति कुरूप है, साथ-साथ…

  • 27th Dec 2017

    128. पेड़!

    किसी ज़माने में कविताएं लिखने का बहुत चाव था। उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी। ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और…

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