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197. अपने घर के लिए, इंटीरियर डिजाइनर क्यों?
(Advantages of Hiring an Interior Designer and Architect for Your New Home) ID Prop –Details आप अपना नया घर बनवाते हैं, पुराने घर का नवीकरण कराते हैं, तब यह क्यों जरूरी है कि आप इंटीरियर डिजाइनर की सेवाएं प्राप्त करें? एक बात तो आप मानेंगे कि इंसान के जो सबसे बड़े सपने होते हैं जीवन…
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196. ये न होता तो क्या होता!
#AlterationsToLife IndiSpire पर दिए गए संदर्भ से प्रेरणा लेते हुए आज का आलेख लिख रहा हूँ। लेकिन मैं उन प्रसंगों का ही उल्लेख कर रहा हूँ जिनसे मेरे जीवन, मेरे करियर को सकारात्मक दिशा मिली है। ऐसे प्रसंग नहीं हैं जिनके बारे में मैं नकारात्मक रूप में लिख सकूं। मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में…
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195. गाते गाते रोये मयूरा, फिर भी नाच दिखाए!
फिर से अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो महान कलाकार और भारत के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर जी की शुरू की एक फिल्म- ‘आशिक़’ से है, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीतकार है- शंकर जयकिशन की जोड़ी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस…
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194. राख के ढ़ेर में शोला है ना चिंगारी है!
आज मोहम्मद रफी जी के मधुर और बुलंद स्वर में, कैफी आज़मी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो शोला और शबनम फिल्म के लिए ज़नाब मोहम्मद ज़हूर तथा खैयाम जी के संगीत निर्देशन में रिकॉर्ड किया गया था। इन गीतों को सुनने पर यह गर्व होता है कि पहले कैसे महान…
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193. वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया!
कई दिन से पुराने ब्लॉग परोस रहा था, वैसे एक बात है कि जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तब बहुत अधिक उत्साह था, काफी कुछ मन में था- ये कहना है, ये भी कहना है। पुराने ब्लॉग ज्यादातर साथियों के साथ शेयर भी नहीं हुए थे। आगे भी कुछ ऐसे ब्लॉग शेयर करूंगा। आज सर्वेश्वर…
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55. मोहसिन मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी !
आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- संगीत की एक शाम याद आ रही है, कई वर्ष पहले की बात है, दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में गज़ल गायक- गुलाम अली जी का कार्यक्रम था। मेरे बेटे ने मेरे शौक को देखते हुए मेरे लिए एक टिकट खरीद लिया था, रु.5,000/- का,…
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54. जीवों का साहचर्य !
आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग, जो पिछले वर्ष अगस्त में लिखा था- आज गोवा में आए एक महीना हो गया। 3 जुलाई को दोपहर बाद यहाँ पहुंचे थे, गुड़गांव से। बहुत से फर्क होंगे जीवन स्थितियों में, जिनके बारे में समय-समय पर, प्रसंगानुसार चर्चा की जा सकती है। एक फर्क…
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53. पहाड़ों के क़दों की खाइयां हैं !
आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है- पहाडों के क़दों की खाइयां हैं बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं। यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और…
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52. …. पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था !
आज फिर से पुराने ब्लॉग की बारी है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं- करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं, बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े…
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192. परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं! #DEFINITELYPTE
आज जबकि दुनिया इतनी छोटी हो गई है, पहले जितना हम देश के किसी दूसरे शहर में बच्चे के पढ़ने जाने अथवा नौकरी पर जाने के बारे में सोचते थे, उतना अब विदेशों में जाने के बारे में भी नहीं सोचते हैं। आज पूरी दुनिया कितनी छोटी हो गई है, हम लोग और शायद हमसे…