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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Jun 2019

    अकेली जब जाती हूँ मैं रात्रि वेला में- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 9th Jun 2019

    ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ!

    कल एक गज़ल शेयर की थी राज़ इलाहाबादी साहब की और ये बात की थी कि कैसे कवि-शायर लोग दुख में, गम में भी स्वाद ढूंढ लेते हैं। आज भी गज़ल के माध्यम से आंसुओं के स्वाद की बात करेंगे, ‘ इस उम्र से हूँ लज्ज्ज़्त-ए- गिरियां से भी महरूम, यानि बहुत दिनों से आंसुओं…

  • 8th Jun 2019

    आप फिर मुस्कुरा दीजिए!

    आज एक पुरानी गज़ल याद आ रही है, जिसे अनूप जलोटा जी ने गाया है, शायद कुछ और कलाकारों ने भी गाया होगा। अब ये कवि-शायर लोग ही होते हैं, जो दुख में, गम में भी स्वाद ढूंढ लेते हैं। वैसे गज़ल में हर शेर स्वतंत्र होता है, इस गज़ल में कुछ शेर वास्तव में…

  • 7th Jun 2019

    दूर से देखता हूँ- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 6th Jun 2019

    एक स्वप्न के तिमिरासन्न मार्ग पर – रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 5th Jun 2019

    हर बात के लिए!

    कुछ विज्ञापन वास्तव में बहुत सुंदर बन जाते हैं। ऐसा ही एक विज्ञापन आजकल टीवी पर आता है, शायद सारेगामा- पुराने गानों के संग्रह के बारे में, विज्ञापन में एक वृद्ध पिता घर के आंगन में अखबार पढ़ रहे हैं, उनका युवा बेटा वहाँ आता है और उनको रेडियो टाइप कुछ सौंपता हैं, जिसमें बताया…

  • 4th Jun 2019

    62. वह जो नाव डूबनी है मैं उसी को खे रहा हूँ!

    आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- जिस प्रकार मौसम पर बात करना बहुत आसान सा काम होता है, टाइम पास वाला काम, अगर आप इसको भी काम कहना चाहें, उसी प्रकार अपने मुहल्ले के बारे में बात करना भी एक अच्छा टाइम-पास होता था, विशेष रूप…

  • 2nd Jun 2019

    What do we need- Specialists or Generalists!

    Today I am making my submission on the #IndiSpire prompt, which says- Would you rather be a specialist or a generalist? Future society will need more specialists or polymaths? Your thoughts on this debate which is going on since ‘Philosophy’ branched out to know more and more about less and less. #SpecialistVsGeneralist While thinking on…

  • 1st Jun 2019

    क्या बात है क्यों हैरान हैं हम!

    राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ के कुछ गीत शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम प्रस्तुति है। मैंने 2-3 गीत छोड़ दिए हैं और आज अंतिम गीत इस फिल्म से शेयर कर रहा हूँ।     जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है- प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म- संगम की कहानी में गीतों की भी…

  • 31st May 2019

    जाने कब इन आंखों का शरमाना जाएगा!

    पिछले तीन दिनों से मैं राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ के कुछ गीत शेयर कर रहा हूँ। सचमुच वह एक अलग ही समय था जब किसी-किसी फिल्म का हर गीत मास्टरपीस होता था और हर गीत सुपरहिट होता था। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है- प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म- संगम की कहानी को आगे…

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