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तेरे मकाँ तक पहुँचे !
वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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ख़ामोश है सारी महफ़िल!
इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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अशआर मेरे यूं तो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं जां निसार अख्तर साहब की एक ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे अनूप जलोटा जी ने भी गाया है- अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *******
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हम तेरी चाह में!
हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे । गोपाल दास नीरज
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वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है!
तुम अपने क़स्बों में जा के देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं,कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर
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हम तो मस्त फकीर!
आज मैं हिंदी गीतों के राजकुंवर कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत– हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे।जैसा अपना आना प्यारे, वैसा…
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ताज़गी अब कहीं नहीं है!
वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं,यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर
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वरक़ पलटता हूँ मैं!
गुज़र गया वक़्त दिल पे लिख कर न जाने कैसी अजीब बातें.वरक़ पलटता हूँ मैं जो दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर
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वो आदमी अब कहीं नहीं है!
बहुत दिनों बा’द पाई फ़ुर्सत तो मैं ने ख़ुद को पलट के देखा,मगर मैं पहचानता था जिस को वो आदमी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर