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क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!
एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार
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फूल कुम्हलाने लगे हैं!
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कमाल के फूल कुम्हलाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार
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कभी कभी !
हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं- कभी कभी जब मेरी तबियतयों ही घबराने लगती है,तभी ज़िन्दगी मुझे न जानेक्या-क्या समझाने…
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उसे हवा कर दे!
मैं उस के जोर को देखूँ वो मेरा सब्र-ओ-सुकूँ,मुझे चराग़ बना दे उसे हवा कर दे| राना सहरी
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रस्ता हरा भरा कर दे!
ये रेत्ज़ार कहीं ख़त्म ही नहीं होता,ज़रा सी दूर तो रस्ता हरा भरा कर दे| राना सहरी