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होंठों पे चिंगारी रखो!
आँख में पानी रखो, होंठों पे चिंगारी रखो,ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो| राहत इन्दौरी
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर – बादल और लहरें
एक बार फिर बारी है पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने की| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है…
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बेनाम ख़बर के हम हैं!
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम,हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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किस राहगुज़र के हम हैं!
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब,सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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कभी चांद नगर के हम हैं!
जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं,कभी धरती के, कभी चांद नगर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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कहाँ के हैं, किधर के हम हैं!
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से,किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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दूसरे घर के हम हैं!
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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उधर के हम हैं!
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली
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चला गया मटरू!
बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, शायद सात-आठ माह हुए हों, मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने घर की बॉलकनी में आकर एक मेहमान के स्थापित होने की सूचना दी थी| उसी समय गोवा में तूफान आया था, शायद उससे भी इस मेहमान के आने का संबंध हो, यह एक श्वेत कपोत था,…