-
वफ़ा ढूंढ रहे हैं!
इस अहद के इंसां मे वफ़ा ढूंढ रहे हैं,हम ज़हर की शीशी मे दवा ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
-
वह झंकार है कविता!
नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं- धूप, धुआँ, पानी में,ऋतु की मनमानी में,सूख गए पौधे तोमन को मत कोसना,और काम सोचना| आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही…
-
ले के गिरेबाँ का तार तार चले!
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब,गिरह में ले के गिरेबाँ का तार तार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
तुम्हारे नाम पे आयेंगे!
बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही,तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़म-गुसार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
जो कू-ए-यार से निकले तो–
मकाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जँचा ही नहीं,जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
जो हम पे गुज़री सो गुज़री!
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ,हमारे अश्क तेरी आकबत सँवार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
आज ज़िक्र-ए-यार चले!
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो,कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
गुलशन का कारोबार चले!
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले,चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
आदतें डालने पर!
काफी लंबा समय हो गया ये ब्लॉग लिखते हुए| मैंने कभी यह नहीं सोचा कि विद्वान लोग ही इसको पढ़ें और अपनी सम्मति दें| जो भी मेरा पाठक है, वह मेरी दृष्टि में सबसे विद्वान है|शुरुआत मैंने की थी अपने जीवन के प्रसंगों, प्रारंभिक जीवन जो दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए बिताया, उसके बाद विभिन्न स्थानों…
-
हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ!
सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ,मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा| बशीर बद्र