-
मन में घुलती रही–
हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन,मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
तेरी बात चली मीलों तक!
मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा,बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
इक पीर पली मीलों तक!
माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी,मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
चली साथ में बिटिया की हँसी!
घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी,ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
प्यार में कैसी थकन!
प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली,कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
दुख की गली मीलों तक!
प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर,ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
धूप चली मीलों तक!
ज़िंदगी यूं भी जली, यूं भी जली मीलों तक,चाँदनी चार क़दम, धूप चली मीलों तक| कुंवर बेचैन
-
अंग-अंग चंदन वन हो गया!
हिन्दी के एक प्रमुख कवि और बच्चों के लिए ‘पराग’ पत्रिका का संपादन करने वाले स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ | यह एक श्रेष्ठ रूमानी कविता है, आशा है आप सभी को पसंद आएगी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की यह कविता –…
-
सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो!
मय-कशी के लिए ख़ामोश भरी महफ़िल में, सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो ये ज़रूरी तो नहीं| ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी