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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Feb 2022

    हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं!

    बिके पानी समन्दर के किनारे,हक़ीक़त पर्वतों की राइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 24th Feb 2022

    मुलाज़िम झूठ की-

    हवा बिजली के पंखे बांटते हैं,मुलाज़िम झूठ की सच्चाइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 24th Feb 2022

    गले मिलिए तो-

    गले मिलिए तो कट जाती हैं जेबें,बड़ी उथली यहां गहराइयां हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 24th Feb 2022

    अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं!

    है ऐसी तेज़ रफ़्तारी का आलम,कि लोग अपनी ही ख़ुद परछाइयाँ हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 24th Feb 2022

    पहाड़ों के क़दों की–

    पहाड़ों के क़दों की खाइयाँ हैं,बुलन्दी पर बहुत नीचाइयाँ हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 24th Feb 2022

    यहां भी है वहां भी!

    आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय शायर ज़नाब निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल में वास्तव में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात कही है और बताया है कि धार्मिक उन्माद में बहने वाले लोग इधर भी हैं और उधर भी| जो सज्जन…

  • 23rd Feb 2022

    मेरा दिल ही दुखाने आई!

    तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली,जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई| कैफ़ भोपाली

  • 23rd Feb 2022

    इक आवाज़ बुलाने आई!

    मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था,दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई| कैफ़ भोपाली

  • 23rd Feb 2022

    खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई!

    दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी,किसकी खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई| ‘कैफ़’ भोपाली

  • 23rd Feb 2022

    कुछ अक्ल ठिकाने आई!

    आजकल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें है वही,हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई| ‘कैफ़’ भोपाली

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