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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Mar 2022

    हारो न खुद को तुम!

    दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे। निदा फ़ाज़ली

  • 6th Mar 2022

    मगर अजनबी रहे!

    बदला न अपने आप को, जो थे वही रहेमिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे। निदा फ़ाज़ली

  • 6th Mar 2022

    नये-पुराने शहरों में!

    हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में,जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है । निदा फ़ाज़ली

  • 6th Mar 2022

    सबके अपने-अपने साँचे हैं!

    चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं,जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है| निदा फ़ाज़ली

  • 6th Mar 2022

    सन्नाटों में बोलनेवाला-

    मेरे आंगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे,सन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है। निदा फ़ाज़ली

  • 6th Mar 2022

    आज हैं केसर रंग रंगे वन!

    आज मैं तारसप्तक के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| गिरिजा कुमार माथुर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए थे| इस कविता में वसंत के सौन्दर्य को बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…

  • 5th Mar 2022

    जिससे अब तक मिले नहीं वो-

    मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैं,जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है । निदा फ़ाज़ली

  • 5th Mar 2022

    अब घर अच्छा लगता है!

    नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है,कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है। निदा फ़ाज़ली

  • 5th Mar 2022

    पके खेत सी शादाब लगे!

    घर के आंगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन,रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे| निदा फ़ाज़ली

  • 5th Mar 2022

    खिड़की निकले कहीं मेहराब लगे!

    अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म,कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे| निदा फ़ाज़ली

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