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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Mar 2022

    हज़ारों साल की कोई इमारत सी!

    उदासी पतझड़ों की शाम ओढ़े रास्ता तकती |पहाड़ी पर हज़ारों साल की कोई इमारत सी || बशीर बद्र

  • 9th Mar 2022

    मगर कैसी हिक़ारत सी!

    वो जैसे सर्दियों में गर्म कपड़े दे फ़क़ीरों को |लबों पे मुस्कुराहट थी मगर कैसी हिक़ारत सी || बशीर बद्र

  • 9th Mar 2022

    बच्चों की कापी में इबारत सी!

    हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी,हिरन की पीठ पर बैठे परिन्दे की शरारत सी| बशीर बद्र

  • 9th Mar 2022

    कठपुतली!

    स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी तरह के अनूठे रचनाकार थे जो बड़ी सरलता से, बातचीत के लहज़े में बहुत गहरी बात कह जाते थे| भवानी दादा को अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे लेकिन यह भी सत्य है कि फिल्मों की मायानगरी में वे एडजस्ट नहीं हो पाए थे और वहां उन्होंने…

  • 8th Mar 2022

    जुबां है किसी बेजुबान की!

    जुल्फों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की| गोपालदास ‘नीरज’

  • 8th Mar 2022

    रौशनी अपने मकान की!

    औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद होबेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की| गोपालदास ‘नीरज’

  • 8th Mar 2022

    ज्यों लूट ले कहार ही-

    ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी,हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की| गोपालदास ‘नीरज’

  • 8th Mar 2022

    शुरुआत मेरी दास्तान की!

    बुझ जाये सरे आम ही जैसे कोई चिराग,कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की| गोपालदास ‘नीरज’

  • 8th Mar 2022

    जमीन पे छत आसमान की!

    हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो,आ जायेगी जमीन पे छत आसमान की| गोपालदास ‘नीरज’

  • 8th Mar 2022

    खुशबू सी आ रही है इधर!

    खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,खिडकी खुली है गालिबन उनके मकान की| गोपालदास ‘नीरज’

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