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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Mar 2022

    अपने सुख़न में ढलते हैं!

    तुम बनो रंग, तुम बनो ख़ुशबू,हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    देखने वाले हाथ मलते हैं!

    हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद,देखने वाले हाथ मलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    खुश है हम उससे जलते हैं!

    क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में,जो भी खुश है हम उससे जलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    अब घर से कम निकलते हैं!

    वो है जान अब हर एक महफ़िल की,हम भी अब घर से कम निकलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    और जिस तरह बहलते हैं!

    मैं उसी तरह तो बहलता हूँ यारों,और जिस तरह बहलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    कहाँ टालने से टलते हैं!

    उसके पहलू से लग के चलते हैं,हम कहाँ टालने से टलते हैं| जॉन एलिया

  • 10th Mar 2022

    बस तेरा नाम ही लिखा देखा!

    आज स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| सुदर्शन फ़ाकिर जी ने कुछ बहुत सुंदर रचनाएं हमें दी हैं| जगजीत सिंह जी और अन्य अनेक गायकों ने फ़ाकिर जी की रचनाओं को गाया है| लीजिए आज प्रस्तुत है सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक बहुत लोकप्रिय और प्रभावशाली ग़ज़ल, इस ग़ज़ल को…

  • 9th Mar 2022

    तौर तरीक़े मुझे कम आते हैं!

    मैंने दो चार किताबें तो पढ़ी हैं लेकिन |शहर के तौर तरीक़े मुझे कम आते हैं || *****ख़ूबसूरत सा कोई हादसा आँखों में लिये |घर की दहलीज़ पे डरते हुए हम आते हैं || बशीर बद्र

  • 9th Mar 2022

    कभी चांदी के क़लम आते हैं!

    मुझसे क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिये |कभी सोने कभी चांदी के क़लम आते हैं || बशीर बद्र

  • 9th Mar 2022

    सौ अहले करम आते हैं!

    दिल वो दरवेश है जो आँख उठाता ही नहीं |इस के दरवाज़े पे सौ अहले करम आते हैं || बशीर बद्र

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