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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Mar 2022

    मैं सर झुका रही थी कि!

    ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए,मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    इक ख़त छुपा रही थी!

    कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में,इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    कि तुम याद आ गए!

    तुमको भुला रही थी कि तुम याद आ गए,मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    वो लड़का ग़रीब था!

    दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    गले में निशान-ए-सलीब था!

    मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को,हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    और समुंदर क़रीब था!

    बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे,घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    तेरे शहर के लोग!

    आज मोहसिन नक़वी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया था| कई बार यही खयाल आता है कि श्री जगजीत सिंह जी जैसे लोकप्रिय गायक यदि नहीं होते तो इन महान शायरों की शायरी हम सब तक कैसे पहुँच पाती? एक प्रसंग याद या रहा…

  • 26th Mar 2022

    हथेली पे मेरा नसीब था!

    मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था| अंजुम रहबर

  • 26th Mar 2022

    वो उतनी दूर हो गया!

    मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था,वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था| अंजुम रहबर

  • 26th Mar 2022

    ये दुनिया सौ रंग दिखाती है!

    हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है,रोकर कभी हंसती है हंसकर कभी गाती है,ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई| अली सरदार जाफ़री

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