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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Mar 2022

    चल मेरे साथ ही चल!

    हिन्दी फिल्मों के एक प्रमुख गीतकार और प्रसिद्ध शायर जनाब हसरत जयपुरी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| मुझे ध्यान आता है कि मेरे प्रिय नायक, निर्माता और निर्देशक- राज कपूर साहब की फिल्मों में जहां संगीतकार शुरू की बहुत सारी फिल्मों में शंकर – जयकिशन की जोड़ी होती थी, पुरुष गायक…

  • 28th Mar 2022

    चराग़ जलाने इधर न आएगा!

    ‘वसीम’ अपने अँधेरों का ख़ुद इलाज करो,कोई चराग़ जलाने इधर न आएगा। वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    मकान शहर में कोई!

    लगेगी आग तो सम्त-ए-सफ़र न देखेगी,मकान शहर में कोई नज़र न आएगा| वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    ये बादल इधर न आएगा!

    मना रहे हैं बहुत दिन से जश्न-ए-तिश्ना-लबी,हमें पता था ये बादल इधर न आएगा| वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    मिट्टी का घर न आएगा!

    बनेंगे ऊँचे मकानों में बैठकर नक़्शे,तो अपने हिस्से में मिट्टी का घर न आएगा| वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    कभी लौटकर न आएगा!

    ये ज़िंदगी का मुसाफ़िर ये बे-वफ़ा लम्हा,चला गया तो कभी लौटकर न आएगा| वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    आँसू नज़र न आएगा!

    तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा,तो मेरी आँख में आँसू नज़र न आएगा| वसीम बरेलवी

  • 28th Mar 2022

    इन दिनों है दुख शिखर पर!

    आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| जीवन में कितना कुछ होता है अभिव्यक्त करने के लिए जिसको कविगण, विशेष रूप से गीतकार बहुत सरल और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर देते हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह…

  • 27th Mar 2022

    इक रेल जा रही थी कि!

    ‘अंजुम’ तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़,इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए| अंजुम रहबर

  • 27th Mar 2022

    मैं गुनगुना रही थी कि!

    कल शाम छत पे मीर-तक़ी-‘मीर’ की ग़ज़ल,मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए| अंजुम रहबर

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