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अवशिष्ट !
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत…
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बैठ के अपने यारों में!
सब का दिल हो अपने जैसा अनहोनी सी बात लगे,’नक़्श’ यह क्या सोचा करते हो बैठ के अपने यारों में। नक़्श लायलपुरी
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इश्क़ ने जब जब रक़्स किया है!
काँप उठे हैं शाहों के दिल, महलों की बुनियाद हिली,इश्क़ ने जब जब रक़्स किया है शाहों के दरबारों में। नक़्श लायलपुरी
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बस्ती के चौबारों में!
हर पनघट पर मेरे फ़साने, चौपालों पर ज़िक्र मेरा,मेरी ही बातें होती हैं बस्ती के चौबारों में। नक़्श लायलपुरी
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इतना दर्द कहाँ से आया!
गीत है या फ़रियाद किसी की, नग़मा है या दिल की तड़प,इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में। नक़्श लायलपुरी
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चाँदी जैसी लहरें गिरती!
जाने कितनी नदियों को धनवान बनाया झरनों ने,चाँदी जैसी लहरें गिरती देखी हैं कोहसारों में। नक़्श लायलपुरी
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मुझको चुनवा दो दीवारों में!
लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में।मैंने प्यार किया है मुझको चुनवा दो दीवारों में। नक़्श लायलपुरी
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इक कली खिल गई एक मुरझा गई!
मौत और ज़िन्दगी क्या हैं इसके सिवा,इक कली खिल गई एक मुरझा गई। नक़्श लायलपुरी
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नवनिर्माण का संकल्प!
नवगीत आंदोलन के शिखर पुरूष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत एक तरह से सभी रचनाकारों और सजग नागरिकों की तरफ से एक संकल्प गीत है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर! यहाँ राह अपनी बनाने…